वह सुपात्र और कुपात्र के भेद में फंसकर घूम रहा है।
वह ढूंढ रहा है कि मेहर (प्रभु/गुरु अनुग्रह, grace) कहां से होगी, कैसे होगी, कौन करेगा, कब होगी?
जिस दिन वह जान लगा कि खुद ही पात्र है, उस दिन खुद पर खुद ने ही मेहर (grace) कर दी।
उस दिन, उस पल से, वहाँ से, यात्रा की असली शुरुआत होगी। तब तक तो सिर्फ जगह पर ही गोल-गोल घूम रहा है। परेशान हो रहा है।